ऐ हवा! ये बता की फिज़ा में चैन ए अमन गुलज़ार कब होगा?
मेरे मेहबूब का दीदार और उनसे बेपनाह प्यार कब होंगे?
शहर का मिजाज़ यूं समझ रहे है ,
हम ख़ुद ही बेजुबान बन रहे है ।
आवाजों के बाजारों में , ख़ुद को
ख़ामोश कर रहें है।
एक अदत ख़ामोशी ज़रूरी है
सुकुन ए-शहर के लिए ,
हम संघर्षों में भी जीना ढूंढ रहें है।