#किसान/कृषक:उम्मीदों के सहारे -
अपने देश की बात करे तो किसान व कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।६०% से भी ज्यादा लोग इस पेशे मे शामिल है इसका आशय यह भी ही एक बड़ी आबादी की जिंदगी मे सुखहाली का साधन कृषि ही है और देश की समृद्धि मे महत्वपूर्ण भी क्योंकि अपने जीडीपी का लगभग १४% से ज्यादा कृषि ही देता है।लेकिन दुर्भाग्य देखिये इतने बड़े सेक्टर की सुधि कोई लेने वाला नही है जब मैं यह लिख रहा हूँ उस समय बेसमय मौसम की मार किसान झेल रहे है अभी भी फसल पूरी तरह से नही कटी है इसका आशय यह हुआ कि महीनों की मेहनत का जब फल लेने का समय आया तब मौसम के मार से पूरी मेहनत ,श्रम भेंट चढ़ गया ।यह विषय इसलिए भी जरूरी है कि हमारे यहाँ कृषक बहुत ही संघर्षो के बाद फ़सल लगाते है क्योंकि उसकी माली हालत किसी से छुपी नही है। पूँजी से संघर्ष करता किसान, बीमा का हाल नही जानता और ना ही कृषकों के मदद को कोई एजेंसी या संस्थाएं आगे ही आती है।
१)गाँधी जी भारत को गाँव का देश कहते और गाँव मे किसान /कृषक लेकिन इनकी सुधी कब ली जाएंगी?शासन द्वारा प्रयासों को प्रशासन द्वारा लालफीताशाही के भेंट चढ़ जाती है। चाहे बाढ़ राहत राशी हो या जैविक महामारी। केंद्र ,राज्य के प्रयासों को कृषको तक पहुचने ही नही दिया जाता।
जहाँ मा.प्रधानमंत्री ने किसानों के विकास के लिये उनकी आय दूगनी करने का जनांदोलन छेड़ा है लेकिन जिला प्रशासन व तहसील, खण्ड प्रशासन के ढिलाई से कई सुविधाओं से किसान वंचित ही रह जा रहा है।
ऐसे मे शासन की यह नैतिक जिम्मदारी है कि प्रशासन पर जरूरी नियंत्रण रखें जिससे कि सुविधाओं का आम जन कृषकों तक पहुँच सके।
२)तथा जब वैश्विक महामारी कोरोनॉ ने पूरे सेक्टर को तबाह कर दिया है हर विभाग वित्तिय मदद दी जा रही है ऐसे मे कृषि को अछूता क्यों?
जबकि अमेरिका जैसे देश ने अपने कृषि के लिए करोड़ो की वित्तिय मदद की हम पीछे क्यो ? ज्ञात हो कि सबसे बड़ी आबादी को वित्त व रोज़गार कृषि से ही मिलता है ।
ऐसे मे यह जरूरी है कि कृषको का ध्यान व वित्तिय मदद की जाय।
३)राज्य सरकारों का भी यह दायित्व है कि यह जरूरी घोषणा पूर्व मे करे कि मौसम परिवर्तन हो वाला है जिससे कि समस्या ,संकट से बचा जा सके।
यह उम्मीद ही है जो कृषकों को जिंदा और संगर्ष के लिए मजबूत बनाती है।
अपने देश की बात करे तो किसान व कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।६०% से भी ज्यादा लोग इस पेशे मे शामिल है इसका आशय यह भी ही एक बड़ी आबादी की जिंदगी मे सुखहाली का साधन कृषि ही है और देश की समृद्धि मे महत्वपूर्ण भी क्योंकि अपने जीडीपी का लगभग १४% से ज्यादा कृषि ही देता है।लेकिन दुर्भाग्य देखिये इतने बड़े सेक्टर की सुधि कोई लेने वाला नही है जब मैं यह लिख रहा हूँ उस समय बेसमय मौसम की मार किसान झेल रहे है अभी भी फसल पूरी तरह से नही कटी है इसका आशय यह हुआ कि महीनों की मेहनत का जब फल लेने का समय आया तब मौसम के मार से पूरी मेहनत ,श्रम भेंट चढ़ गया ।यह विषय इसलिए भी जरूरी है कि हमारे यहाँ कृषक बहुत ही संघर्षो के बाद फ़सल लगाते है क्योंकि उसकी माली हालत किसी से छुपी नही है। पूँजी से संघर्ष करता किसान, बीमा का हाल नही जानता और ना ही कृषकों के मदद को कोई एजेंसी या संस्थाएं आगे ही आती है।
१)गाँधी जी भारत को गाँव का देश कहते और गाँव मे किसान /कृषक लेकिन इनकी सुधी कब ली जाएंगी?शासन द्वारा प्रयासों को प्रशासन द्वारा लालफीताशाही के भेंट चढ़ जाती है। चाहे बाढ़ राहत राशी हो या जैविक महामारी। केंद्र ,राज्य के प्रयासों को कृषको तक पहुचने ही नही दिया जाता।
जहाँ मा.प्रधानमंत्री ने किसानों के विकास के लिये उनकी आय दूगनी करने का जनांदोलन छेड़ा है लेकिन जिला प्रशासन व तहसील, खण्ड प्रशासन के ढिलाई से कई सुविधाओं से किसान वंचित ही रह जा रहा है।
ऐसे मे शासन की यह नैतिक जिम्मदारी है कि प्रशासन पर जरूरी नियंत्रण रखें जिससे कि सुविधाओं का आम जन कृषकों तक पहुँच सके।
२)तथा जब वैश्विक महामारी कोरोनॉ ने पूरे सेक्टर को तबाह कर दिया है हर विभाग वित्तिय मदद दी जा रही है ऐसे मे कृषि को अछूता क्यों?
जबकि अमेरिका जैसे देश ने अपने कृषि के लिए करोड़ो की वित्तिय मदद की हम पीछे क्यो ? ज्ञात हो कि सबसे बड़ी आबादी को वित्त व रोज़गार कृषि से ही मिलता है ।
ऐसे मे यह जरूरी है कि कृषको का ध्यान व वित्तिय मदद की जाय।
३)राज्य सरकारों का भी यह दायित्व है कि यह जरूरी घोषणा पूर्व मे करे कि मौसम परिवर्तन हो वाला है जिससे कि समस्या ,संकट से बचा जा सके।
यह उम्मीद ही है जो कृषकों को जिंदा और संगर्ष के लिए मजबूत बनाती है।
जय हिंद।